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आंवला नवमी: सौभाग्य और मेधावी संतान के लिए

Posted by Vedic Astrology on November 17, 2015

तिथि: 20 नवम्बर
—-आर के श्रीधर

आंवला नवमी, कार्तिक मास की शुंक्ल पक्ष की नवमी को ”आंवला नवमी“ कहते हैं। इस दिन आंवला वृक्ष की पूजा की जाती है तथा रात्रि भोजन आंवला वृक्ष के नीचे ही करना चाहिए जिससे अखंड सौभाग्य, आरोग्य, संतान व सुख की प्राप्ति होती है। अक्षय नवमी का शास्त्रों में वही महत्व बताया गया है जो वैशाख मास की तृतीया का है। शास्त्रों के अनुसार अक्षय नवमी के दिन किया गया पुण्य कभी समाप्त नहीं होता है। इस दिन जो भी शुभ कार्य जैसे दान, पूजा, भक्ति, सेवा किया जाता है उनका पुण्य कई-कई जन्म तक प्राप्त होता है। इसी प्रकार इस दिन कोई भी शास्त्र विरूद्घ काम किया जाए तो उसका दंड भी कई जन्मों तक भुगतना पड़ता है इसलिए अक्षय नवमी के दिन ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे किसी को कष्ट पहुंचे।
शास्त्रों में बताया गया है कि भोजन के समय थाली में आंवले का पत्ता गिरे तो यह बहुत ही शुभ होता है। थाली में आंवले का पत्ता गिरने से यह माना जाता है कि आने वाले साल में व्यक्ति की सेहत अच्छी रहेगी।
इस दिन द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था। कहा जाता है कि आज ही विष्णु भगवान ने कुष्माण्डक दैत्य को मारा था और उसके रोम से कुष्माण्ड की बेल हुई। इसी कारण कुष्माण्ड का दान करने से उत्तम फल मिलता है। इसमें गन्ध, पुष्प और अक्षतों से कुष्माण्ड का पूजन करना चाहिये। विधि विधान से तुलसी का विवाह कराने से कन्यादान तुल्य फल मिलता है।
Amla

प्रचलित कथा
काशी नगर में एक निःसन्तान धर्मात्मा तथा दानी वैश्य रहता था। एक दिन वैश्य की पत्नी से एक पड़ोसन बोली यदि तुम किसी पराये बच्चे की बलि भैरव के नाम से चढ़ा दो तो तुम्हे पुत्र प्राप्त होगा। यह बात जब वैश्य को पता चली तो उसने अस्वीकार कर दिया। परन्तु उसकी पत्नी मौके की तलाश मे लगी रही। एक दिन एक कन्या को उसने कुएं में गिराकर भैरो देवता के नाम पर बलि दे दी। इस हत्या का परिणाम विपरीत हुआ। लाभ की जगह उसके पूरे बदन में कोढ़ हो गया तथा लड़की की प्रेतात्मा उसे सताने लगी। वैश्य के पूछने पर उसकी पत्नी ने सारी बात बता दी। इस पर वैश्य कहने लगा गौवध, ब्राह्मण वध तथा बाल वध करने वाले के लिए इस संसार मे कहीं जगह नहीं है, इसलिए तू गंगातट पर जाकर भगवान का भजन कर तथा गंगा में स्नान कर तभी तू इस कष्ट से छुटकारा पा सकती है।
वैश्य पत्नी गंगा किनारे रहने लगी। कुछ दिन बाद गंगा माता वृद्धा का वेष धारण कर उसके पास आयी और बोली तू मथुरा जाकर कार्तिक नवमी का व्रत तथा आंवला वृक्ष की परिक्रमा कर तथा उसका पूजन कर। यह व्रत करने से तेरा यह कोढ़ दूर हो जाएगा। वृद्धा की बात मानकर वैश्य पत्नी अपने पति से आज्ञा लेकर मथुरा जाकर विधिपूर्वक आंवला का व्रत करने लगी। ऐसा करने से वह भगवान की कृपा से दिव्य शरीर वाली हो गई तथा उसे पुत्र प्राप्ति भी हुई।
विष्णु का स्वरूप है आंवला
शास्त्रों के अनुसार आंवला, पीपल, वटवृक्ष, शमी, आम और कदम्ब के वृक्षों को चारों पुरुषार्थ दिलाने वाला कहा गया है। इनके समीप जप-तप पूजा-पाठ करने से प्रारब्ध के सभी पाप मिट जाते हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार पूर्वकाल में जब समस्त संसार समुद्र में डूब गया था तो जगतपिता ब्रह्मा जी के मन में सृष्टि उत्पन्न करने का विचार आया। वे एकाग्रचित होकर ‘ऊं नमो नारायणाय’ का उपांशु जप करने लगे। वर्षों बाद जब भगवान विष्णु उन्हें दर्शन-वरदान देने हेतु प्रकट हुए और इस कठिन तपस्या का कारण पूछा तो ब्रह्मा जी ने कहा- ‘हे! जगतगुरु मैं पुन: सृष्टि आरम्भ करना चाहता हूं। आप मेरी सहायता करें।’ तब विष्णु जी कहा- ‘ब्रह्मादेव! आप चिंता न करें।’ विष्णु जी के दिव्य दर्शन एवं आश्वासन से ब्रह्मा जी भावविभोर हो उठे। उनकी आंखों से भक्ति-प्रेम वश आंसू बह कर नारायण के चरणों पर गिर पड़े, जो तत्काल वृक्ष के रूप में परिणत हो गए। ब्रह्मा जी के आंसू और विष्णु जी के चरण के स्पर्श मात्र से वह वृक्ष अमृतमय हो गया। विष्णु जी उसे धात्री (जन्म के बाद पालन करने वाली दूसरी मां) नाम से अलंकृत किया। सृष्टि सृजन के क्रम में सबसे पहले इसी ‘धात्रीवृक्ष’ की उत्पत्ति हुई। सब वृक्षों में प्रथम उत्पन्न होने के कारण ही इसे ‘आदिरोह’ भी कहा गया है। विष्णु जी ने ब्रह्मा जी को वरदान दिया- ‘ सृष्टि सृजन के क्रम में यह धात्री वृक्ष आप की मदद करेगा। जो जीवात्मा इसके फल का नियमित सेवन करेगी, वह त्रिदोषों- वात, पित्त एवं कफ जन्य रोगों से मुक्त रहेगी। कार्तिक नवमी को जो भी जीव धात्री वृक्ष का पूजन करेगा, उसे विष्णु लोक प्राप्त होगा।’ तभी से इस तिथि को धात्री नवमी या आंवला नवमी के रूप में मनाया जाता है। पद्म पुराण में भगवान शिव ने कार्तिकेय से कहा है ‘आंवला वृक्ष साक्षात् विष्णु का ही स्वरूप है। यह विष्णु प्रिय है और इसके स्मरण मात्र से गोदान के बराबर फल मिलता है।’
माता लक्ष्मी से सम्बन्ध
धात्री के वृक्ष की पूजा एवं इसके वृक्ष के नीचे भोजन करने की प्रथा की शुरूआत करने वाली माता लक्ष्मी मानी जाती हैं। इस संदर्भ में कथा है कि एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण करने आयीं। रास्ते में भगवान विष्णु एवं शिव की पूजा एक साथ करने की इच्छा हुई। लक्ष्मी मां ने विचार किया कि एक साथ विष्णु एवं शिव की पूजा कैसे हो सकती है। तभी उन्हें ख्याल आया कि तुलसी एवं बेल का गुण एक साथ आंवले में पाया जाता है। तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है और बेल शिव को।
आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक चिह्न मानकर मां लक्ष्मी ने आंवले की वृक्ष की पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोजन करवाया। इसके बाद स्वयं भोजन किया। जिस दिन यह घटना हुई थी उस दिन कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि थी। इसी समय से यह परंपरा चली आ रही है।
अक्षय नवमी के दिन अगर आंवले की पूजा करना और आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन बनाना और खाना संभव नहीं हो तो इस दिन आंवला जरूर खाना चाहिए। चरक संहिता के अनुसार अक्षय नवमी को आंवला खाने से महर्षि च्यवन को फिर से जवानी यानी नवयौवन प्राप्त हुआ था।
अक्षय नवमी की पूजन विधि-
प्रात:काल स्नान कर आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है| पूजा करने के लिए आँवले के वृक्ष की पूर्व दिशा की ओर उन्मुख होकर षोडशोपचार पूजन करें| दाहिने हाथ में जल, चावल, पुष्प आदि लेकर व्रत का संकल्प करें|
अद्येत्यादि अमुकगोत्रोमुक (गोत्र का उच्चारण करें) ममाखिलपापक्षयपूर्वकधर्मार्थकाममोक्षसिद्धिद्वारा श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं धात्रीमूले विष्णुपूजनं धात्रीपूजनं च करिष्ये।
ऐसा संकल्प कर आंवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा की ओर मुख करके ऊँ धात्र्यै नम: मंत्र से आह्वानादि षोडशोपचार पूजन करके निम्नलिखित मंत्रों से आंवले के वृक्ष की जड़ में दूध की धारा गिराते हुए पितरों का तर्पण करें-

पिता पितामहाश्चान्ये अपुत्रा ये च गोत्रिण:।
ते पिबन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेक्षयं पय:।।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवा:।
ते पिवन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेक्षयं पय:।।
इसके बाद आंवले के वृक्ष के तने में निम्न मंत्र से कच्चे सूत्र लपेटें-
दामोदरनिवासायै धात्र्यै देव्यै नमो नम:।
सूत्रेणानेन बध्नामि धात्रि देवि नमोस्तु ते।।
इसके बाद कर्पूर या घृतपूर्ण दीप से आंवले के वृक्ष की आरती करें तथा निम्न मंत्र से उसकी प्रदक्षिणा करें –
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे।।
आंवले के वृक्ष के नीचे ब्राह्मण भोजन भी कराना चाहिए और अन्त में स्वयं भी आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन करना चाहिए। एक पका हुआ कुष्मांडा या कुम्हड़ा (कद्दू) लेकर उसके अंदर रत्न, सुवर्ण, रजत या रुपया आदि रखकर निम्न संकल्प करें-
ममाखिलपापक्षयपूर्वक सुख सौभाग्यादीनामुक्तरोत्तराभिवृद्धये कूष्माण्डदानमहं करिष्ये।
तदनन्तर ब्राह्मण को तिलक करके दक्षिणा सहित कुम्हड़ा दे दें और निम्न प्रार्थना करें-
कूष्णाण्डं बहुबीजाढयं ब्रह्णा निर्मितं पुरा।
दास्यामि विष्णवे तुभ्यं पितृणां तारणाय च।।
पितरों के शीतनिवारण के लिए यथाशक्ति कंबल आदि ऊनी वस्त्र भी ब्राह्मण को देना चाहिए। अगर घर में आंवले का वृक्ष न हो तो किसी बगीचे में या गमले में आंवले का पौधा लगा कर यह कार्य सम्पन्न करना चाहिए| इसे कुष्मांडा नवमी भी कहते हैं|

आंवला नवमी को किस राशि के लोग क्या करें और क्या ना करें

मेष
क्या करें- ब्राह्मण को घर बुलाकर सम्मान करें।
क्या न करें- भाग दौड़ अधिक नहीं करें।
वृषभ
क्या करें- भैरव आराधना करें।
क्या न करें- निवेश से बचें।
मिथुन
क्या करें- ॐ श्री सूर्याय नम: का जाप करें।
क्या न करें- यात्रा नहीं करें।
कर्क
क्या करें- लाल पुष्प का पौधा लगायें।
क्या न करें- परिजनों के विवाद से बचें।
सिंह
क्या करें- शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति को दान दें।
क्या न करें- मांसाहार का सेवन नहीं करें।
कन्या
क्या करें- गरीब को भोजन करायें।
क्या न करें- मानसिक दबाव अधिक लेने से बचें।
तुला
क्या करें- श्री शिवचालीसा का पाठ करें।
क्या न करें- गलत संगत में समय नहीं गवाएं।
वृश्चिक
क्या करें- सरसों तेल, उड़द का दान करें।
क्या न करें- बड़ों का उपहास नहीं करें।
धनु
क्या करें- मस्तक पर तिलक धारण करें।
क्या न करें- अपनी वाणी पर संयम रखें।
मकर
क्या करें- ॐ शुं शुक्राय नम:का जाप करें।
क्या न करें- परिवार की अनदेखी नहीं करें।
कुम्भ
क्या करें- रजत आभूषण धारण करें।
क्या न करें- बच्चों पर क्रोध नहीं करें।
मीन
क्या करें- ॐ वृ वृहस्पतये नम: का जाप करें।
क्या न करें- जल्दी धन लाभ के लिए किसी को धोखा नहीं दें।

आंवले का ग्रहों से सम्बन्ध

ज्योतिष में बुध ग्रह की पीड़ा शान्ति कराने के लिये आंवले के प्रयोग के साथ स्नान कराया जाता है। जिस व्यक्ति का बुध ग्रह पीडि़त हो उसे शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार को स्नान जल में- आंवला, शहद, गोरोचन, स्वर्ण, हरड़, बहेड़ा, गोमय (गोबर) एंव अक्षत डालकर निरन्तर 15 बुधवार तक स्नान करना चाहिए जिससे उस जातक का बुध ग्रह शुभ फल देने लगता है। इन सभी चीजों को एक कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। उपरोक्त सामग्री की मात्रा दो-दो चम्मच पर्याप्त है। पोटली को स्नान करने वाले जल में 10 मिनट के लिये रखें। एक पोटली 7 दिनों तक प्रयोग कर सकते है।

जिन जातकों का शुक्र ग्रह पीडि़त होकर उन्हे अशुभ फल दे रहा है। वे लोग शुक्र के अशुभ फल से बचाव हेतु शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को हरड़, इलायची, बहेड़ा, आंवला, केसर और एक सफेद फूल युक्त जल से स्नान करें तो लाभ मिलेगा। इन सभी पदार्थों को एक कपड़े में बाधकर पोटली बना लें। उपरोक्त सामग्री की मात्रा दो-दो चम्मच पर्याप्त रहेगी। पोटली को स्नान के जल में 10 मिनट के लिये रखें। एक पोटली को एक सप्ताह तक प्रयोग में ला सकते है।

आंवला और वास्तु

आंवले का वृक्ष घर में लगाना वास्तु की दृष्टि से शुभ माना जाता है। पूर्व की दिशा में बड़े वृक्षों को नहीं लगाना चाहिए परन्तु आंवले को इस दिशा में लगाने से सकारात्मक उर्जा का प्रवाह होता है। इस वृक्ष को घर की उत्तर दिशा में भी लगाया जा सकता है। जिन बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता है या फिर स्मरण शक्ति कमजोर है, उनकी पढ़ने वाली पुस्तकों में आंवले व इमली की हरी पत्तियों को पीले कपड़े में बांधकर रख दें।

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